ये कविता मैंने श्रीकृष्ण के गीता में कहे २ श्लोको को ध्यान में रख के रची है ,
१- कर्मण्ये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन ( do your duty without thinking of results)
२- ना दैन्यं ना पलायनम -- ( Neither beg nor escape )
कर्म -युद्ध
कर्म युद्ध में तन जा योद्धा ,
दैन्य पलायन विचार न कर,
विपदाओ के घाव मिलें यदि,
पलट पलट चीत्कार न कर,
सोच मत की जीत होगी,
या की होगी भीषण हार,
कूद पड़ जीवन समर में ,
जय पराजय विचार न कर,
कर्म युद्ध में तन जा योद्धा ,
दैन्य पलायन विचार न कर.......
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समर है ये खेल नहीं बस,
रिपु भी मिलेंगे जान ले तू,
आज है काटों भरा पथ,
कल पुष्प मिलेंगे मान ले तू,
खो न जाना पुष्प वृन्द में,
शूल भी छिपे होंगे कहीं,
दमन कर शूलों का तू,
रक्त जख्म विचार न कर,
कर्म युद्ध में तन जा योद्धा ,
दैन्य पलायन विचार न कर........
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मार्ग में हो घोर तम यदि,
आशाओं के दीप जला ले,
धैर्य हो यदि जर्जर निर्बल,
साहस को तू मीत बना ले,
निशा तिमिर पसरा है पथ पर,
दृढ निश्चय से फैला प्रकाश,
दमन कर निश- अन्धकार तू,
शुक्ल कृष्ण विचार न कर,
कर्म युद्ध में तन जा योद्धा ,
दैन्य पलायन विचार न कर.....
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कर्म में है अधिकार तेरा,
बस कर्म करना है तुझे,
जीवन है ये अग्नि पथ ,
हर क्षण जलना है तुझे,
बस जीत ही है लक्ष्य तेरा,
मृत्यु में बस हार है ,
बाधाओं से लड़ता रह तू,
जीवन मृत्यु विचार न कर,
कर्म युद्ध में तन जा योद्धा ,
दैन्य पलायन विचार न कर---
विवेक "विक्की"